जशन ऐ मोहब्बत

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सूरज के कदम संध्या की ओर बढ़ रहे थे ।  गुनगुनी धूप अन्धकार में तबदील होती दिख रही थी।  रात की ख़ामोशी सूखे पत्तियों से लिपटी रात की रानी की तरह  नीले आसमान का मुकुट सजाए लज्जापूर्वक चंद्रमा को देख रही थी।  ऐसा लग रहा था मानो कोई शायर अपनी नज़्म शब्दो में साँझ रहा हो।  उस रात में एक अलग सा  नशा था, ऐसा प्रतीत होता था मानो कामदेव , रतिसंग अपने आसन  पर विराजमान हो।  मोहब्बत एक अलग ही रंग ले रही थी। इस सुन्दर वातावरण में लाहौर की गालियाँ क्या खूब खिल रही थी ।  नूरी  दुल्हन के  जोड़े में अल्लाह की रहमत लग रही थी।  नूरी  की बारात बादशाही मस्जिद से होकर घर आई।  मोहल्ले के लोग खिड़कियों से झांकते किसी दर्शक से कम नहीं लग रहे थे।

एक और बारात का शौर और दूसरी तरफ़ उन् अंग्रेज़ी लाठियों की आवाज़ थी ।  भारत अपना होकर भी पराया था , वो थी सन 1931  की रात थी । उस रात  नूरी  रहीम की दुल्हन बनी और फाँसी शहीद  – ए – आज़म भगत सिंह की।

” मेरी दुल्हन तो आज़ादी है ” शेरों की तरह यह नारा लगाया था , 23 साल की बाल उम्र में अपना सब लुटाया था , आज भी रूह कांपती है , उस जोश भरी आवाज़ सुन कर , सलाम है उस   बहादुर सिख को , सलाम है उस भगत सिंह को।  भूला कर भी  नहीं भूलना 28 सितम्बर 1907  की तारीख  , जब विद्यावती जैसी पूज्य माँ की कोख से भारत का शेर “भगत सिंह,” इस दुनिया में आया था। क्या खूब धर्म निभाया था, लाखों का नहीं फांसी का हार सजाया था। बात है यह लाखो की , एक की क़ुरबानी सब पर भारी थी।  कह कर देखो आज के नौजवानो को , यह देश है बेकारी, यह नारा लगाते हैं, फिर भी खुद को भारत का वासी बताते हैं ।

 

आज भी हमारे दिलो में ज़िंदा है भगत सिंह ।  हम गर्व से कहते है कि हम उस भारत के नागरिक है जहाँ शहीद ऐ आज़म भगत सिंह ने जन्म लिया था ।  जलियांवाला बाग हादसे ने मासूम सिंह का दिल दहलाया था।  पर कसम खा कर वो चंद्रशेखर आज़ादसंग क्रांतिकारी संगठन ले कर आया था।

 

उसे क़ुरबानी मंज़ूर थी पर उसे “पराया भारत” जंजीर सा लगता था , इसलिए वो 23 मार्च, 1931 को हँसते-हँसते अपनी दुल्हन मिला ।  खुली बाहों से दुल्हन ने उसका स्वागत किया।  उस शेर की दुल्हन आज़ादी थी । संग अपने बाराती भी ले गया , सुखदेव और राजगुरू ने क्या खूब निभाई।  लग गए गले मुस्कुरा कर वह उस आज़ादी के।  उस अफ़साने को याद करो ।  आज़ादी और  शहीद ऐ आज़म भगत सिंह की एक अलग ही कहानी थी ।

यह थी दासता हमारे भारत की।  अगर ज़रा सा भी सन्देह हो भारत की वीरता पर तो गाथा  पढ़ लेना भगत सिंह की।

 

 

 

 

 

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